क्या आपका फोन आपकी बातें सुन रहा है? सच जानकर शायद आप भी अपनी Privacy Settings बदल दें

कभी आपने गौर किया है कि किसी चीज के बारे में दोस्त से बात की और थोड़ी देर बाद उसी चीज का विज्ञापन मोबाइल पर दिखाई देने लगा?
मान लीजिए आप किसी दिन कार खरीदने की बात कर रहे हैं। कुछ समय बाद सोशल मीडिया खोलते ही कार के विज्ञापन सामने आने लगते हैं। कभी ऐसा होता है कि किसी होटल या घूमने की जगह के बारे में चर्चा हुई और अगले ही दिन उसी जगह के होटल और टिकट के विज्ञापन दिखने लगे।
ऐसे में मन में पहला सवाल यही आता है—क्या हमारा फोन हमारी बातें सुन रहा है?
यह सवाल आज सिर्फ आम मोबाइल यूजर के मन में नहीं है। डिजिटल दुनिया में निजी जानकारी कितनी सुरक्षित है, इसे लेकर पूरी दुनिया में बहस होती रही है। हालांकि हर बार किसी विज्ञापन का हमारी बातचीत से मेल खाना इस बात का सबूत नहीं है कि फोन ने हमारी बातचीत रिकॉर्ड करके विज्ञापन दिखाया।
असल में कहानी थोड़ी अलग और कहीं ज्यादा दिलचस्प है।
आपका फोन आपकी आदतों से बहुत कुछ समझ सकता है
आज मोबाइल सिर्फ फोन नहीं रह गया है। हम इससे क्या खोजते हैं, कौन-सा वीडियो कितनी देर देखते हैं, किस पोस्ट पर रुकते हैं, किस वेबसाइट पर जाते हैं और किन चीजों को खरीदने में दिलचस्पी दिखाते हैं—इन सबका डिजिटल निशान कहीं न कहीं बनता रहता है।
मान लीजिए आपने इंटरनेट पर एक नए मोबाइल की कीमत देखी। उसके बाद उसी मोबाइल का रिव्यू पढ़ा और फिर किसी ऑनलाइन दुकान पर जाकर उसकी कीमत देख ली।
आपने किसी को यह नहीं बताया कि आपको वह फोन खरीदना है। फिर भी विज्ञापन प्रणाली के लिए इतना समझना मुश्किल नहीं है कि आपकी उस फोन में दिलचस्पी हो सकती है।
इसके बाद उसी तरह के विज्ञापन आपको दूसरी वेबसाइटों या ऐप पर दिखाई देने लगें तो आपको लग सकता है कि फोन आपकी बात सुन रहा था।
कई बार वास्तव में ऐसा नहीं होता।
आपने खुद अपनी ऑनलाइन गतिविधियों के जरिए पर्याप्त संकेत दे दिए होते हैं।
लेकिन माइक्रोफोन का क्या?
यह सवाल भी जायज है।
मोबाइल में माइक्रोफोन होता है और कई ऐप उससे जुड़ी अनुमति मांगते हैं। इसलिए किसी ऐप को माइक्रोफोन की अनुमति देने से पहले यह देखना जरूरी है कि उसे इसकी जरूरत क्यों है।
हर ऐप को माइक्रोफोन की जरूरत नहीं होती।
अगर कोई ऐसा ऐप जिसे आवाज से कोई लेना-देना नहीं है, वह माइक्रोफोन की अनुमति मांग रहा है, तो एक बार रुककर सोचना चाहिए।
अपने फोन की Settings में जाकर यह देखना भी मुश्किल नहीं है कि किन ऐप्स को माइक्रोफोन की अनुमति मिली हुई है।
यही बात कैमरा और लोकेशन पर भी लागू होती है।
असली खेल Data का है
इंटरनेट पर हमारी पहचान सिर्फ हमारे नाम या मोबाइल नंबर से नहीं बनती।
हमारी पसंद, हमारी खोज, हमारी ऑनलाइन खरीदारी, हमारी पसंदीदा सामग्री और कई बार हमारी लोकेशन भी हमारे बारे में बहुत कुछ बता सकती है।
सोचिए, कोई व्यक्ति रोज शाम एक खास जिम जाता है, फिटनेस से जुड़े वीडियो देखता है, प्रोटीन और जूते ऑनलाइन खोजता है और सप्ताहांत में खेलों से जुड़ी वेबसाइट देखता है।
इन सबको जोड़ने पर उसकी रुचि का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसके लिए किसी को उसकी बातचीत सुनने की जरूरत नहीं है।
यही वजह है कि आज Digital Privacy का सवाल केवल “मेरा फोन मुझे सुन रहा है या नहीं” तक सीमित नहीं रह गया है।
सवाल यह है कि हम अपने बारे में इंटरनेट पर कितना डेटा छोड़ रहे हैं।
लोकेशन भी कम जानकारी नहीं देती
कई लोग बिना सोचे हर ऐप को Location की अनुमति दे देते हैं।
लेकिन अगर कोई ऐप आपकी लोकेशन लगातार या बार-बार जान सकता है, तो इससे आपकी दिनचर्या के बारे में काफी जानकारी सामने आ सकती है।
आप कहां रहते हैं, कहां काम करते हैं, किन जगहों पर जाते हैं और कितनी देर रुकते हैं—इन चीजों का पैटर्न आपकी रोजमर्रा की जिंदगी की एक तस्वीर बना सकता है।
इसलिए किसी ऐप को Location की अनुमति देने से पहले यह देखना अच्छा है कि उसे वास्तव में इसकी जरूरत है भी या नहीं।
Incognito Mode भी आपको पूरी तरह नहीं छिपाता
बहुत से लोग मानते हैं कि Chrome या किसी दूसरे ब्राउजर का Incognito Mode चालू करते ही वे इंटरनेट पर पूरी तरह गुमनाम हो जाते हैं।
ऐसा नहीं है।
Incognito Mode मुख्य रूप से आपके डिवाइस पर browsing history जैसी स्थानीय जानकारी को सामान्य तरीके से सेव होने से रोकने के लिए होता है। इसका मतलब यह नहीं कि इंटरनेट पर आपकी पूरी पहचान गायब हो जाती है।
इसी तरह VPN भी कोई ऐसा जादुई उपाय नहीं है जिससे आप इंटरनेट पर पूरी तरह invisible हो जाएं।
फिर अपनी Privacy बचाने के लिए क्या करें?
सबसे पहले अपने फोन की Settings खोलिए और एक बार देखिए कि कौन-कौन से ऐप आपके Camera, Microphone, Location और Contacts का इस्तेमाल कर सकते हैं।
आपको खुद हैरानी हो सकती है कि ऐसे कुछ ऐप भी permission लेकर बैठे हैं जिनका आप इस्तेमाल तक नहीं करते।
जरूरत न हो तो permission हटाइए।
पुराने और बेकार ऐप भी फोन से निकाल देना बेहतर है।
इसके अलावा हर जगह एक ही password रखने की आदत छोड़ना और जरूरी accounts में Two-Factor Authentication चालू करना भी समझदारी है।
और सबसे जरूरी बात—किसी भी अनजान link पर सिर्फ इसलिए क्लिक न करें क्योंकि वह किसी दोस्त के नाम से आया है या उसमें कोई आकर्षक offer दिखाई दे रहा है।
तो क्या फोन हमारी बातें सुनता है?
इसका जवाब हर मामले में हां या ना में देना सही नहीं होगा।
कुछ ऐप्स को माइक्रोफोन का इस्तेमाल करने की अनुमति दी जा सकती है और वे उस अनुमति का उपयोग अपने काम के लिए कर सकते हैं। लेकिन केवल इस वजह से कि आपने किसी चीज के बारे में बात की और फिर उसका विज्ञापन दिखाई दिया, यह साबित नहीं होता कि फोन ने आपकी बातचीत सुनकर वह विज्ञापन दिखाया।
कई बार आपकी Search History, Location, Browsing Activity और Online Behaviour इतनी जानकारी दे देते हैं कि विज्ञापन प्रणाली आपकी रुचि का अनुमान लगा सके।
और शायद यही बात ज्यादा सोचने वाली है।
क्योंकि हमें अक्सर लगता है कि हमने इंटरनेट पर अपने बारे में कुछ खास नहीं बताया। जबकि सच यह है कि हम हर दिन अपनी पसंद और आदतों के बारे में बहुत सारे छोटे-छोटे संकेत छोड़ते रहते हैं।
मोबाइल से डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसे समझने की जरूरत जरूर है।
अगली बार कोई ऐप आपसे Camera, Microphone या Location की अनुमति मांगे तो बिना सोचे “Allow” दबाने के बजाय एक बार खुद से पूछिए—
“आखिर इस ऐप को इसकी जरूरत क्यों है?”
शायद आपकी डिजिटल Privacy की शुरुआत यहीं से हो।
इंडिया नेशन लाइव के लिए विशेष रूप से प्रकाशित
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