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कच्चा तेल 91 डॉलर के पार! भारत की बढ़ी चिंता, रुपये पर दबाव और महंगाई का खतरा

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18 August 2026 · Editorial Desk

Crude Oil Price India: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत की चिंता भी बढ़ गई है।

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव बढ़ने का असर कच्चे तेल की कीमतों पर दिखाई देने लगा है। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट कच्चा तेल 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। इसके साथ ही भारतीय रुपये पर भी दबाव बढ़ा और रुपया करीब तीन सप्ताह के निचले स्तर तक पहुंच गया।

कच्चे तेल की बढ़ती कीमत भारत के लिए चिंता की बात है, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अगर लंबे समय तक तेल महंगा रहता है तो इसका असर रुपये, आयात खर्च और महंगाई पर पड़ सकता है।

आखिर तेल इतना महंगा क्यों हुआ?

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत से शांति की उम्मीद कमजोर हुई है। इसी बीच अस्थायी युद्धविराम को आगे नहीं बढ़ाने की बात सामने आई है।

ईरान ने भी अपना रुख और कड़ा कर लिया है। इससे बाजार में यह डर बढ़ा है कि आने वाले दिनों में तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। खास चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है, जहां से दुनिया का बड़ी मात्रा में तेल गुजरता है।

मंगलवार को ब्रेंट कच्चा तेल बढ़कर करीब 91.76 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो 30 जुलाई के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर है। अमेरिकी कच्चा तेल भी बढ़कर करीब 85.55 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।

भारत पर क्यों पड़ता है ज्यादा असर?

भारत की अर्थव्यवस्था में कच्चे तेल की अहम भूमिका है। देश में पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और कई दूसरे उत्पादों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की जरूरत होती है।

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारतीय कंपनियों को उसी तेल के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे देश का आयात बिल बढ़ता है।

दूसरी तरफ, तेल खरीदने के लिए डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर भी दबाव आ सकता है। मंगलवार को रुपया करीब 95.68 रुपये प्रति डॉलर तक कमजोर हुआ। बाजार में यह भी देखा गया कि भारतीय रिजर्व बैंक रुपये में ज्यादा गिरावट रोकने के लिए डॉलर की बिक्री कर रहा है।

Crude Oil Price India बढ़ने से भारत पर क्या असर होगा? क्या पेट्रोल-डीजल महंगा होगा?

यह सवाल इस समय सबसे ज्यादा लोगों के मन में है।

लेकिन अभी यह कहना सही नहीं होगा कि कच्चा तेल 91 डॉलर पहुंचते ही पेट्रोल और डीजल महंगा हो जाएगा।

पेट्रोल-डीजल की कीमत कई बातों पर निर्भर करती है। इसमें अंतरराष्ट्रीय तेल कीमत, रुपये और डॉलर की दर, कर और तेल कंपनियों की लागत जैसे कई कारक शामिल होते हैं।

अगर कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो तेल कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

महंगाई पर भी बढ़ सकता है दबाव

महंगे तेल का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता।

डीजल महंगा होने पर सामान ढोने का खर्च बढ़ सकता है। ट्रक, बस और दूसरे परिवहन साधनों की लागत बढ़ने का असर धीरे-धीरे कई वस्तुओं की कीमतों पर दिखाई दे सकता है।

इसी वजह से कच्चे तेल की कीमत बढ़ने को महंगाई के लिए एक बड़ा जोखिम माना जाता है।

अगर तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहती है तो रिजर्व बैंक के लिए भी स्थिति मुश्किल हो सकती है, क्योंकि एक तरफ आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने की जरूरत होती है और दूसरी तरफ महंगाई पर नजर रखनी पड़ती है।

शेयर बाजार पर भी दिखा असर

तेल की बढ़ती कीमत और रुपये में कमजोरी का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा।

मंगलवार को कारोबार की शुरुआत में निफ्टी करीब 0.27 प्रतिशत गिरकर 24,219.80 और सेंसेक्स 0.40 प्रतिशत नीचे 77,418.06 पर पहुंच गया। आईटी क्षेत्र में भी दबाव देखने को मिला।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई। रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी निवेशकों ने सोमवार को भारतीय शेयर बाजार से करीब 2,535 करोड़ रुपये निकाले।

रुपये के लिए क्यों बढ़ी मुश्किल?

भारत को कच्चा तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत होती है। जब तेल महंगा होता है तो आयातकों की डॉलर की मांग बढ़ सकती है।

अगर डॉलर की मांग बढ़ती है और दूसरी तरफ विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो रुपये पर दोहरा दबाव बन सकता है।

इसी वजह से मंगलवार को रुपये में कमजोरी देखने को मिली। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक लगातार बाजार में हस्तक्षेप करके रुपये में तेज गिरावट को रोकने की कोशिश कर रहा है।

अगर तेल 100 डॉलर तक पहुंचा तो?

फिलहाल कच्चे तेल के 100 डॉलर तक जाने को लेकर केवल आशंकाएं हैं। ऐसा होगा ही, यह कहना संभव नहीं है।

लेकिन अगर पश्चिम एशिया का तनाव लंबा खिंचता है और तेल की आपूर्ति में बड़ी रुकावट आती है, तो कीमतों में और तेजी आ सकती है।

ऐसी स्थिति भारत के लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगी। इससे आयात खर्च बढ़ सकता है, रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और महंगाई को नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है।

वहीं अगर अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ती है और तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता कम होती है, तो कीमतों में राहत भी आ सकती है।

सरकार और RBI के सामने क्या चुनौती है?

Reuters के अनुसार, इस समय सरकार और RBI दोनों की नजर कच्चे तेल की कीमतों पर बनी हुई है।

RBI पहले ही रुपये में तेज गिरावट रोकने के लिए बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है। दूसरी तरफ सरकार के लिए यह जरूरी है कि महंगे तेल का असर आम लोगों और अर्थव्यवस्था पर ज्यादा न पड़े।

भारत के पास विदेशी मुद्रा भंडार का भी सहारा है। Reuters के मुताबिक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार चार महीने बाद पहली बार 700 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच गया है। इससे बाहरी दबाव से निपटने में कुछ मदद मिल सकती है।

आम आदमी पर क्या असर पड़ सकता है?

अगर कच्चा तेल कुछ दिनों या हफ्तों तक ही महंगा रहता है तो इसका असर सीमित रह सकता है।

लेकिन अगर कीमत लंबे समय तक 90-100 डॉलर के आसपास बनी रहती है तो इसका असर धीरे-धीरे दिखाई दे सकता है।

आम लोगों के लिए मुख्य चिंता होगी:

  • पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव
  • माल ढुलाई महंगी होना
  • यात्रा खर्च बढ़ना
  • कई वस्तुओं की कीमतों पर असर
  • महंगाई बढ़ने का खतरा
  • रुपये में कमजोरी का असर

हालांकि इनमें से किसी भी चीज की कीमत अभी निश्चित रूप से बढ़ेगी, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।

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आगे क्या देखना होगा?

आने वाले दिनों में बाजार की नजर मुख्य रूप से अमेरिका-ईरान बातचीत, होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आवाजाही और कच्चे तेल की कीमत पर रहेगी।

अगर तनाव कम होता है तो तेल की कीमत नीचे आ सकती है। लेकिन तनाव बढ़ा और आपूर्ति प्रभावित हुई तो भारत समेत तेल आयात करने वाले देशों की मुश्किल बढ़ सकती है।